भारतीय बाजार नियामक SEBI (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) ने हाल ही में म्यूचुअल फंड के खर्च ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव को मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य निवेशकों पर लगने वाले खर्च को कम करना, पारदर्शिता बढ़ाना और शुल्क की संरचना को आसान बनाना है।
कुल व्यय अनुपात (Expense Ratio) में बड़ा बदलाव
अब SEBI ने पारंपरिक टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) की जगह Base Expense Ratio (BER) को लागू करने का निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत अब सभी वैधानिक शुल्क जैसे STT, GST, स्टाम्प ड्यूटी, SEBI शुल्क और एक्सचेंज फीस को BER में शामिल नहीं किया जाएगा। इससे खर्च की तस्वीर निवेशकों के लिए काफी स्पष्ट होगी।
इस नए नियम के अनुसार:
✔ Index funds और ETF के लिए BER की सीमा को 1% से घटाकर 0.90% किया गया है।
✔ अन्य कैटेगरी जैसे Fund of Funds के लिए भी BER की सीमा में कमी की गई है।
✔ यह नियम सभी प्रमुख श्रेणियों पर लागू होगा।
ब्रोकरेज कैप में भी संशोधन
SEBI ने यह भी तय किया है कि म्यूचुअल फंड को जो ब्रोकरेज शुल्क देना होता था, उसकी सीमा को संशोधित किया जाए। अब:
🔹 कैश मार्केट लेन-देन पर ब्रोकरेज का कैप 0.12% से घटाकर 0.06% कर दिया गया है।
🔹 डेरिवेटिव मार्केट में यह सीमा 0.05% से घटकर 0.02% हो गई है।
इसका मतलब यह है कि फंड मैनेजमेंट पर लगने वाला खर्च भी कम होगा, जिससे छोटे और रिटेल निवेशकों को लाभ मिलेगा।
निवेशकों को सीधा लाभ क्यों मिलेगा?
पहले कुल खर्च में वैधानिक शुल्क भी शामिल होता था, जिससे निवेशकों के लिए वास्तविक लागत पता लगाना मुश्किल होता था। अब इन खर्चों को अलग करने से:
✅ निवेशकों को सही लागत का अंदाज़ा मिलेगा
✅ पारदर्शिता बढ़ेगी
✅ निवेश का कुल खर्च कम दिखाई देगा
✅ फंड की वास्तविक प्रबंधन लागत पर ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा
सरल शब्दों में, निवेशकों को कम शुल्क और स्पष्ट खर्च संरचना का फायदा मिलेगा।
क्यों आये थे ये बदलाव जरूरी?
पिछले कुछ सालों में म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में खर्च और शुल्क की संरचना काफी जटिल हो गयी थी। इससे छोटी राशियों वाले निवेशक यह समझ नहीं पाते थे कि वास्तविक रूप से उन्हें कितना खर्च देना पड़ रहा है। SEBI के इस नए ढांचे का लक्ष्य यही है कि खर्च स्पष्ट, सुसंगत और प्रबंधनीय बने।
निष्कर्ष
SEBI की नई नियमावली से म्यूचुअल फंड में निवेश करना कम खर्चीला और अधिक पारदर्शी बन जाएगा। निवेशकों को अब यह समझना आसान होगा कि वास्तव में उनकी पूंजी पर कितना खर्च लगाया जा रहा है, और यह बदलाव लंबी अवधि वाले निवेशकों के लिए खास तौर पर फायदेमंद साबित हो सकता है।